Wednesday, 6 May 2020

सुखदेव थापर

पंजाब की धरती वीरों की धरती रही है ,चाहे मुग़ल हो या फिर अंग्रेज या कोई और शत्रु सभी ने पंजाबियो के बौद्धिक और बाहुबल का लोहा माना है ,जितनी विकट स्थिति आई उतनी ही विप्पति समान अग्नि में स्वर्ण की भाती तप के चमक ही बिखेरी है पंजाबियो ने ,इन्ही स्वर्णिम वीरों में से एक है अमर बलिदानी "सुखदेव थापर जी "| हालांकि इनके बारे जितना लिखू कम है मेरे पास शब्द नहीं है इस महान व्यक्ति के लिए फिर भी एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ | सुखदेव थापर जी का जन्म १५ मई १९०७ को लुधिआने के नौ गढ़ मोहल्ले के खत्री परिवार रामलाल थापर और राली देवी के यहाँ हुआ था | लाहौर के नेशनल कॉलेज में एक युवा छात्र के रूप में, उन्होंने भारत के अतीत को समझने और दुनिया भर में हो रहे क्रांतिकारी आंदोलनों की छानबीन करने के लिए अध्ययन मंडलियों की शुरुआत की और इसी कॉलेज में वह पहली बार बलिदानी भगत सिंह और यशपाल जी से मिले थे।सुखदेव हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) की पंजाब इकाई के प्रमुख थे, और भारत को ब्रिटिश शासन की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए पंजाब और उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में क्रांतिकारी कोशिकाओं का आयोजन किया करते थे ,उन्होंने कई क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई, लेकिन उन्हें लाहौर षड्यंत्र मामले में उनके साहसी हमले के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है। बलिदानी सुखदेव को १८ दिसंबर १९२८ के लाहौर षड्यंत्र मामले में उनकी भागीदारी के लिए सबसे अच्छा याद किया जाता है । वह भगत सिंह और शिवराम राजगुरु के मुख्य सहयोगी थे, जिन्होंने १९२८ में स्वतंत्रा बलिदानी लाला लाजपत राय जी की हिंसक मौत के जवाब में उप पुलिस अधीक्षक जे पी. सौंडर्स की हत्या की थी । सुखदेव ने १९२९ में 'जेल भूख हड़ताल' जैसी कई क्रांतिकारी गतिविधियों में मुख्य भूमिका निभाई थी ; वह लाहौर षड्यंत्र (खंड ३ )मामले (१८ दिसंबर १९२८) में अपने उनके मुख्य संचालन व हमले के लिए जाने जाते है | १६ अप्रैल १९२९ के लाहौर षड्यंत्र मामले(खंड ३ ) में उन्हें प्रधान आरोपी, जिसका शीर्षक "ताज बनाम सुखदेव" पढ़ता है ,एक ५८७ पन्नों का उनपर दाखिल किया पर्चा है ,आप इस बात से अंदाजा लगा सकते होंगे की "ताज बनाम सुखदेव" का कितना बड़ा अर्थ है की एक अकेले व्यक्ति से समुच्चे सम्राज्य द्वारा लड़ाई जो साफ़ साफ़ इनके क्रांतिकारी कृत्य को दर्शाता है ,लाहौर षड्यंत्र मामले की पहली सूचना रिपोर्ट (एफआईआर), हैमिल्टन हार्डिंग, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, आर. एस. पंडित के अदालत में अप्रैल १९२९ में विशेष मजिस्ट्रेट, सुखदेव को एक सूची में आरोपी संख्या १ . के रूप में उल्लेख किया गया है और भगत जी १२ , जबकि राजगुरु जी को २० स्थान प्राप्त है | यह सुखदेव ही है जो दल का नेतृत्व करते है और १९२८ में उप पुलिस अधीक्षक जे पी. सौंडर्स की हत्या में समिल्लित भगत सिंह और शिवराम राजगुरु उनका मुख्य सहयोग करते है और यह हमला उन्होंने घातक पुलिस की पिटाई के कारण वयोवृद्ध नेता लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया था | ८ अप्रैल १९२९ में केंद्रीय विधानसभा हॉल में ध्वनि बम विस्फोट के बाद उन्हें और सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उनके अपराध का दोषी ठहराया गया, और फांसी की सजा सुनाई गई | उनको फांसी देने की तिथि २४ मार्च १९३१ तय थी परन्तु जनमानस के मन में उनके प्रति प्रेम और सम्मान से भयभीत होकर अंग्रेजो ने उन्हें एक दिन पूर्व २३ मार्च १९३१ को ही रात्रि को लाहौर कारावास में ही फांसी दे दी और उनके शवों को फ़िरोज़पुर में सतलुज नदी के किनारे चुपके से उनके शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया | मै निचे आपको लाहौर षड्यंत्र मामले(खंड ३ ) की लिंक दे रहा हूँ आप एक बार अवश्य देखे | जय माँ भारती
https://www.abhilekh-patal.in/jsp…/handle/123456789/2742319…

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